करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है और इसे महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु की कामना के साथ रखती हैं। इस व्रत को भी आमतौर पर निर्जला ही रखा जाता है और इसमें तारों की पूजा करके व्रत का पारण करने का विधान है।
इस व्रत को करने के साथ माताएं अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं और अहोई माता से बच्चों की दीर्घायु का आशीर्वाद लेती हैं। इस साल अहोई अष्टमी 01 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी।
ऐसा माना जाता है कि यदि कोई भी महिला इस व्रत की करने के साथ अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करती है, तो घर की सुख समृद्धि के लिए यह अच्छा होता है। ऐसे में मन में एक स्कवाल यह भी आता है कि आखिर अहोई माता हैं कौन और इनके लिए व्रत करना इतना फलदायी क्यों होता है? आइए आपको बताते हैं, इसके बारे में यहां विस्तार से।
अहोई माता कौन हैं?
अहोई माता को मां पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इन्हें मुख्य रूप से संतान की रक्षा करने वाली माता माना जाता है और इनकी पूजा से बच्चों का भाग्य अच्छा होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अहोई माता का स्वरूप साही जैसा दिखाया जाता है और मान्यता है कि प्राचीन समय में एक महिला थी जिसके पुत्र थे।
एक दिन वह खेत में पौधों के लिए मिट्टी खोद रही थी और उसी समय उसने गलती से साही के बच्चों को मार दिया। वो महिला अपनी गलती पर बहुत दुखी हुई और उसने माता पार्वती से क्षमा प्रार्थना की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी संतान सुरक्षित रहेगी। उस समय माता पार्वती ने जिस स्वरूप में महिला को दर्शन दिए उसे ही अहोई माता के रूप में पूजा जाता है और उन्हें स्याहु माता के नाम से भी जाना जाता है।
अहोई माता का स्वरूप कैसा है?
अहोई माता को माता पार्वती का अवतार माना जाता है और उनके स्वरूप को पुतली के आकार में दीवार पर गेरू से या कागज के चित्र में उकेरा जाता है। माता का चित्र ऐसे बनाया जाता है जिसमें आठ कोनों वाला घर की एक पुतली बनाई जाती है। अहोई माता के चित्र के साथ-साथ साही और उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं, जिसका संबंध इससे जुड़ी पौराणिक कथा से है। माता के चित्रण में सूर्य, चंद्रमा भी दिखाए जाते हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी का व्रत करने के पीछे साही के बच्चों की कहानी है। आज भी ऐसा कहा जाता है कि अहोई अष्टमी व्रत करने से अहोई माता संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं और उन्हें अच्छी सेहत का आशीर्वाद देती हैं। ऐसा माना जाता है कि व्रती महिला के बच्चों समेत पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। यही नहीं ऐसा माना जाता है कि अगर निःसंतान महिला भी इस व्रत को करती है, तो उसे संतानसुख की प्राप्ति होती है।
वास्तव में अहोई माता का स्वरूप अत्यंत आकर्षक लगता है और उनकी पूजा से भक्तों को संतान की लंबी उम्र और अच्छी सेहत का आशीर्वाद मिलता है।
