विवेक अवस्थी
कहते हैं, खाली बर्तन ही सबसे ज़्यादा शोर करते हैं…
जिस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश शुरू की थी, वही तथाकथित “एप्स्टीन फाइल्स” क्या अब उल्टा पड़ता दिख रहा है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं के अनुसार, इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर वही पुराना पैटर्न उजागर किया है — सनसनीखेज आरोप, लेकिन ठोस आधार के बिना। शनिवार को केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने तीखे अंदाज़ में जवाब देते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों को भ्रामक और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया।
पुरी ने किसी भी प्रकार की गलत कार्रवाई से साफ इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी बदनाम वित्तीय कारोबारी जेफ्री एप्स्टीन से मिलने की पहल नहीं की। उनके अनुसार, जिस सीमित संपर्क का हवाला दिया जा रहा है, वह संस्थागत माध्यमों के जरिए हुआ था और उस समय एप्स्टीन के आपराधिक मामलों की सच्चाई सार्वजनिक भी नहीं हुई थी।
“मैंने बैठक की मांग नहीं की थी। यह आधिकारिक मंचों के माध्यम से तय हुई थी। ईमेल्स के चुनिंदा अंशों को पढ़कर तथ्यों को नहीं बदला जा सकता,” पुरी ने कहा और आरोप लगाया कि संदर्भ को तोड़-मरोड़ कर विवाद खड़ा किया जा रहा है।

चयनात्मक राजनीति, सबूत नदारद
यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा एप्स्टीन जांच से जुड़े विस्तृत दस्तावेज सार्वजनिक किए गए। हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि करोड़ों दस्तावेजों में पुरी का नाम केवल कुछ बार ही आता है — जो उनके अनुसार आरोपों की पूरी कहानी को ही कमजोर कर देता है।
मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि उस समय उनका भारतीय जनता पार्टी से कोई संबंध नहीं था और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक एवं तकनीकी संभावनाओं को बढ़ावा देने के कार्य में लगे थे।
उन्होंने एप्स्टीन के द्वीप पर जाने या उससे जुड़े किसी विमान में यात्रा करने के आरोपों को सिरे से खारिज किया और कहा कि बाद में जब कुछ व्यक्तियों को लेकर सवाल उठे, तो उन्होंने इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट से जुड़े संपर्क भी समाप्त कर दिए।
कांग्रेस पर पलटवार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रकरण अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए असहज स्थिति बन गया है। आलोचकों का कहना है कि ठोस प्रमाणों के बजाय नाटकीय आरोपों पर निर्भरता विपक्ष की रणनीतिक कमजोरी को दर्शाती है। सरकार समर्थक नेताओं का तर्क है कि लगातार व्यक्तिगत हमले उस विपक्ष की तस्वीर पेश करते हैं जो नीतिगत स्तर पर प्रभावी चुनौती देने में संघर्ष कर रहा है।
सत्तापक्ष ने विवाद के समय पर भी सवाल उठाए हैं और इसे संसद की कार्यवाही बाधित करने की कोशिश बताया है, न कि वास्तविक जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास।
संसद या राजनीतिक रंगमंच?
कमज़ोर आधार वाले मुद्दों पर बार-बार हंगामे को लेकर भी आलोचना हुई है। सरकार समर्थकों का कहना है कि संसद को राजनीतिक प्रदर्शन का मंच बनाने से लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होती हैं और आर्थिक सुधारों व राष्ट्रीय प्रगति से जुड़े महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित होते हैं।
पारदर्शिता पर मंत्री का जोर
पुरी ने दोहराया कि उस समय उनकी गतिविधियाँ भारत की विकास गाथा को आगे बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और डिजिटल विस्तार पर केंद्रित थीं। “मेरा सार्वजनिक जीवन पारदर्शी रहा है। तथ्य स्पष्ट हैं, और सत्य को शोर से साबित करने की जरूरत नहीं होती,” उन्होंने कहा।
धूल बैठने के बाद यह प्रकरण सरकार के उस तर्क को और मजबूत करता दिख रहा है कि आरोपों और संकेतों पर आधारित राजनीति अक्सर उलटी पड़ती है — और अंततः विपक्ष की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर देती है।
