एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्य कोटे के तहत पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एडमिशन के लिए निवास या डोमिसाइल को आधार नहीं बनाया जा सकता। एक साल से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी नीट-पीजी उम्मीदवारों के माता-पिता का कहना है कि राज्यों में एडमिशन के नियम अभी भी अलग-अलग हैं। इससे एक ही राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा देने के बावजूद छात्रों को समान अवसर नहीं मिल पाते हैं।
ये चिंताएं डॉ. तन्वी बहल बनाम श्रेय गोयल मामले में सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी, 2025 के फैसले से जुड़ी हैं, जिसमें कहा गया था कि पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एडमिशन में निवास के आधार पर प्राथमिकता देना स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने क्या कहा था?
कोर्ट ने कहा कि एडमिशन नीट-पीजी स्कोर के आधार पर होने चाहिए। साथ ही केवल सीमित संस्थागत प्राथमिकता की अनुमति दी जानी चाहिए। इसका मतलब है कि किसी छात्र को किसी खास मेडिकल कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के लिए प्राथमिकता मिल सकती है न कि इसलिए कि वह किसी राज्य का निवासी या डोमिसाइल है।
क्या है विवाद?
यह विवाद मुख्य रूप से प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से जुड़ा है, जहां एडमिशन राज्य की काउंसलिंग प्रक्रिया के जरिए होते हैं। कई राज्य डोमिसाइल (मूल निवासी होने) या राज्य-विशेष से जुड़ी अन्य पात्रता शर्तें तय करते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मकसद रेजिडेंस-बेस्ड प्राथमिकता की जगह इंस्टीट्यूशनल प्राथमिकता को लाना था। कुछ राज्यों ने इस फैसले को लागू किया है, जबकि कुछ राज्य अभी भी अलग-अलग पात्रता शर्तों का पालन कर रहे हैं। अगर इन नीतियों को चुनौती दी जाती है तो अदालतें तय करेंगी कि ये फैसले के अनुरूप हैं या नहीं। केंद्र सरकार अभी भी इस मामले की समीक्षा कर सकती है और राज्यों के लिए एक जैसी गाइडलाइंस जारी कर सकती है।”
योग्यता के नियमों में अंतर
गुजरात में जिन उम्मीदवारों ने राज्य के बाहर से एमबीबीएस किया है, उनमें से कुछ के लिए राज्य-विशेष योग्यता की अतिरिक्त शर्तें हैं। महाराष्ट्र में राज्य के बाहर पढ़ाई करने वाले केवल कुछ खास महाराष्ट्र डोमिसाइल वाले उम्मीदवारों को ही आवेदन करने की अनुमति है, जबकि कर्नाटक दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों को काउंसलिंग में भाग लेने की अनुमति देता है। हालांकि उन्हें कर्नाटक आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।
अभिभावकों का कहना है कि इन अंतरों का मतलब है कि समान नीट-पीजी स्कोर वाले छात्रों को पीजी सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करने का समान अवसर नहीं मिल सकता है।
अभिवावकों ने पीएमओ को सौंपा था ज्ञापन
जुलाई में पीएमओ को दिए गए एक ज्ञापन में एक अभिभावक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक समान रूप से लागू करने, एक कॉमन नेशनल काउंसलिंग पोर्टल और साल में दो बार नीट-पीजी परीक्षा आयोजित करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि अलग-अलग राज्यों में छात्रों को एडमिशन के लिए असमान अवसर मिल रहे हैं।
पीएमओ ने इस शिकायत पर ध्यान दिया है लेकिन अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है। माता-पिता का कहना है कि इस सिस्टम से खर्च भी बढ़ जाता है क्योंकि उम्मीदवारों को कई काउंसलिंग प्रक्रियाओं के लिए अलग-अलग रजिस्ट्रेशन करना पड़ता है और हर प्रक्रिया के अपने नियम, समय-सीमा और सिक्योरिटी डिपॉजिट होते हैं।
एक शिकायत के जवाब में एनएमसी ने कहा कि राज्य कोटे के तहत डोमिसाइल या निवास-आधारित आरक्षण राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है और शिकायत करने वाले को संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से संपर्क करने की सलाह दी। 2022 में पीएमओ को एक समान नियमों की मांग वाली ऐसी ही एक शिकायत को चिंताओं पर ध्यान देने के बाद बंद कर दिया गया था।
