महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, महिष्मती नगर के राजा अर्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। उन्होंने भगवान दत्तात्रेय को अपनी तपस्या द्वारा प्रसन्न करके उनसे 10,000 हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया, जिसके बाद वह सहस्त्रार्जुन कहलाया।
सहस्त्रार्जुन को अपनी शक्तियों पर बहुत ज्यादा घंमड हो गया था। एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों से होता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने मेहमान समझकर सहस्त्रार्जुन का आदर-सत्कार किया।
सहस्त्रार्जुन के मन में जगी कामधेनु पाने की इच्छा
ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इंद्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक एक चमत्कारी गाय थी। कामधेनु की मदद से ऋषि ने पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध कर दिया। सहस्त्रार्जुन के मन में उस गाय को पाने का लालच जाग गया और उसने ऋषि से गाय की मांग कर दी, लेकिन ऋषि ने यह कहते हुए गाय देने से इनकार कर दिया कि यह गाय ही उनके जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया है। लेकिन सहस्त्रार्जुन नहीं माना और उसने क्रोध में ऋषि जमदग्नि का आश्रम को उजाड़ दिया। जैसे ही वह कामधेनु गाय को अपने साथ लेकर जाने लगा, तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट गई और स्वर्ग की ओर चली गई।
परशुराम जी को आया क्रोध
इस घटना के बाद जब भगवान परशुराम अपने आश्रम पहुंचे, तो उन्होंने अपने आश्रम को तहस-नहस पाया और अपने माता-पिता के अपमान की बातें सुनकर उनका खून खौल उठा। उन्होंने उसी वक्त सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम ने अपने महाशक्तिशाली फरसे से सहस्त्रार्जुन के हजारों भुजाएं और धड़ को काटकर उसका वध कर दिया।
इसके बाद अपने पिता ऋषि जमदग्नि के आदेशानुसार परशुराम प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा पर चले गए। पीछे से मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने तपस्यारत ऋषि जमदग्रि का सिर काटकर उनका वध कर दिया। माता रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम को विलाप स्वर में पुकारा। जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो उन्होंने सारा दृश्य देखा।
यह थी असली वजह
परशुराम जी ने 21 बार ही क्षत्रियों का विनाश इसलिए किया था, क्योंकि उनकी माता ने शोक में 21 बार छाती पीटी थी। वहीं कुछ जगहों पर यह भी वर्णन मिलता है कि परशुराम ने अपने पिता के शरीर पर 21 घाव देखे थे। तभी उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही नहीं बल्कि समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। बता दें कि परशुराम जी ने संपूर्ण क्षत्रिय जाति का नहीं, बल्कि केवल अधर्मी और अत्याचारी क्षत्रिय शासकों का ही संहार किया था।
